ताज़ीम करो इनकी हिदायत हैं खुदा की
माँ बाप का साया तो इनायत हैं खुदा की/
माँ बाप की ताज़ीम तो बच्चो पे हैं लाजिम
इस पर न करे जो भी अमल हैं वही जालिम
इस तरह के औलादों पे लानत हैं खुदा की
माँ बाप का साया तो इनायत हैं खुदा की /
अल्लाह ने कदमो में रखी माँ के हैं जन्नत
हैं फ़र्ज़ इसी तरह से इनकी भी इताअत
जिस तरह से फ़र्ज़ इताअत हैं खुदा की
माँ बाप का साया तो इनायत हैं खुदा की /
माँ बाप की इज्ज़त करो कहता हैं ये कुरआन
हैं इनको तव्वासुल से ही आबदिये इंसा
दुनिया में हमे भेजा ये हिकमत हैं खुदा की
माँ बाप का साया तो इनायत हैं खुदा की /
माँ बाप का ये लोगो कभी दिल न दुखाना
हर हुक्म पे माँ बाप के सर अपना झुकाना
ये हुक्मे पैगम्बर हैं मासियत हैं खुदा की
माँ बाप का साया तो इनायत हैं खुदा की /
हर घर की ये रौनक हैं हर आँगन की ये ज़ीनत
ये दौलते सफ्कत हैं फकत इनकी बदौलत
माँ बाप सलामत हैं ये रहमत खुदा की
माँ बाप का साया तो इनायत हैं खुदा की /
बतला दो हकीकत ये ज़माने को 'सुहैल ' आज
माँ बाप के सदके से हैं इंसान की मेराज
हम सब पे ये सबसे बड़ी रहमत खुदा की
माँ बाप का साया तो इनायत हैं खुदा की //
शनिवार, 24 अप्रैल 2010
शुक्रवार, 23 अप्रैल 2010
ग़ज़ल
सख्त जां मोम की मानिंद पिघल जाते हैं
दिल के तंदूर में किरदार भी जल जाते हैं /
मोड़ होता हैं जवानी का संभलने के लिए
और सब लोग यही आके फिसल जाते हैं /
किसी इंसान की शोहरत नहीं फन का मेयार
खोटे सिक्के भी तो बाज़ार में चल जाते हैं /
ठोकरे खाके न संभले तो हैं ये तेरा नसीब
लोग तो एक ही ठोकर में संभल जाते हैं /
ताज्केरा देखिये फरमाते हैं क्या अहले सुखन
महफिले शेर में हम लेके ग़ज़ल जाते हैं /
नशा दो आतिशा हो जाता हैं मेरा ये सुहैल
मय के साथ अश्क भी जब जाम में ढल जाते हैं //
गुरुवार, 22 अप्रैल 2010
क्रिकेट का बाज़ार
देश में इन दिनों क्रिकेट को लेकर एक नई बहस सी छिड गयी हैं / कभी देश का धर्म कहे जाने वाले इस खेल में अब वो बात नहीं रही , कुछ हद तक बिसमबिस ओवर के नए संस्करण याने टी ट्वेंटी ने इसे और बर्बाद किया हैं ,भारत में हो रहे इंडियन प्रिमिएर लीग में इस खेल को पूरी तरह बाजारीकरण कर दिया गया हैं साथ ही इस खेल के इस सालाना आयोजन में करोडो रुपयों की बारिस ने इसे धर्म से अलग कर वेश्या जैसा ही बना दिया हैं / दरअसल अंग्रजो की देन इस खेल को हम भारतीयों ने इसे कुछ ज्यादा आत्मसात कर लिया हैं / इसलिए इसके साइड एफ्फेक्ट के लिए हम लोग भी कम जिमेन्दार नहीं हैं / सब काम छोड़ टीवी के सामने बैठने को मजबूर करने वाले इस खेल ने हमे समय और पैसे के बर्बादी के आलावा कुछ नहीं दिया हैं / वही मीडिया ने जिस तरह से इसका महिमामंडन किया हैं वो देश की आम जनता को मुर्ख बनाने के लिए और अपने चैनल को सबसे आगे रखने का एक बड़ा खेल हैं / बात क्रिकेट की हो रही हैं इसलिए फिल्म सितारों और क्रिकेट के गासिप के बिना चर्चा अधूरी रहेगी दरअसल बड़े फिल्मकारों ने और विज्ञापनों ने भी क्रिकेट को मनोरंजन का सबसे बेहतर माध्यम बता कर जनता के जेब पर डाका डाला / मेरी जंहा तक सोच हैं अब समय आ गया हैं हम क्रिकेट के स्थान पर दुसरे खेलो पर भी नज़रे इनायत करे /भारत में ही कई खेल लुप्त हो रहे हैं उसे भी पैसे और आपके समय की जरुरत हैं जरा सोचीये ..............
मंगलवार, 17 नवंबर 2009
सोमवार, 13 जुलाई 2009
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